March 2, 2021

Tej Times News

Satyam Sarvada

देश के अन्नदाता पर आक्रमण

मेरा आप सबसे निवेदन कि इस मसले को कांग्रेसी या भाजपाई बनकर न देखें बल्कि आंख कान खोलकर पढें, समझे और तब बोलें ….

सरकार का सफेद झूठ

प्रश्न संख्या 1 : सरकार सफेद झूठ कैसे बोलती है. सरकार जोरशोर से प्रचार कर रही है नए कानून से किसान अपनी उपज कहीं भी किसी राज्य में बेचने के लिए आजाद होगा.

सच्चाई : जबकि सच ये है कि किसान आज भी अपनी उपज देश में कहीं भी बेच सकता है. देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी किसान को अपना अनाज किसी को बेचने से रोके.

लेकिन हल्ला मचाया जा रहा है कि किसान को आजादी मिल गई. दरअसल आजादी किसान को नहीं मिली है. आजादी कारपोरेट जगत को मिली है कि वह कहीं से किसी किसान से सीधा माल खरीद सकेगा.

आजादी किसान को नहीं कारपोरेट जगत और कंपनियों को मिली है, कालाबाजारी करने की

वह भी बिना मंडी टैक्स या कोई और टैक्स दिए. वह न सिर्फ जितना चाहे माल खरीद सकेगा बल्कि उसे जमा भी कर सकेगा, क्योंकि नए एक्ट में जमाखोरी कानून भी खत्म किया जा रहा है.

अभी तक क्या कानून था

अब तक कोई भी व्यापारी केवल मंडी से ही टैक्स देकर किसानों की उपज खरीद सकता था.

नए बिल ने व्यापारी की इस मजबूरी को खत्म कर दिया है. तो ये बिल किसके हित में है अब ये बताने की जरूरत नहीं है.

घबराहट बता रही है कि बिल कितना खतरनाक है

फस्ली मौसम चल रहा है खरीफ़ का और सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान कर रही है रबी की फसलों का.

डर है कि कहीं देश भर के किसान बगावत न कर दें. इसलिए गेहूं का समर्थन मूल्य 50 रूपए बढ़ा कर 1975 प्रति कुंतल कर दिया गया.

रबी की फसलें अप्रैल मई तक बाजार में आएंगी. तब सरकारी खरीद शुरू होगी. ये घबराहट बता रही है कि ये बिल खतरनाक हैं.

एक देश एक बाजार के नारे के पीछे है विकराल दैत्य

किसानों के बिल को लेकर हो हल्ला मचा है. ‘एक देश, एक बाजार’ का नारा जबरदस्त है.

इस बिल को कारपोरेट जगत के किसी दिग्गज ने तैयार कराया गया है जो केवल किसानों, फसलों और गरीबी का दोहन करने की नीयत से कालाबाजारी से अंकुश हटाया गया है।

गांव की जमीनी हकीकत से बिलकुल अनजान है. क्योंकि बिल की काफी बातें सुनने में बहुत दिलकश लगती हैं लेकिन जमीन पर इससे कोई हालत नहीं बदलने वाले.

कृषि सरकार नहीं करवाती, पहले से निजी हाथों में है

गांवों के 90 फीसदी किसान छोटे या सीमान्त किसान हैं. यही अनुपात पूरे देश का है. सिर्फ बड़े किसान अपनी फसल को सीधे सरकारी क्रय केन्द्रों पर बेचते हैं.जहां उन्हें अपनी फसल के ठीका ठाक पैसे भी मिल जाते हैं. लेकिन 90 फीसदी गरीब किसान अपना अनाज लेकर क्रय केन्द्र पर नहीं जाते. क्योंकि ये उनके लिए झंझट का काम है.

एक तो गिने चुने क्रय केन्द्र हैं. जो कई बार खुलते ही नहीं. दलाल और बिचौलिए जो ज्यादातर राजनीतिक कार्यकर्ता होते हैं भ्रष्ट कृषि अधिकारी से सांठगांठ करके सरकारी खरीद करते हैं. जहां सीजन में क्रय केन्द्र खुलते भी हैं वहां पर ट्रकों की लम्बी लाइनें होती है, जिसमें एक ट्रक का नम्बर कभी चार दिन तो कभी आठ दिन बाद आता है. ये ट्रक बड़े किसानों और ज्यादातर लाइसेंसी आढ़तियों के होते हैं.

आज गेंहू का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1925 रु. कुंतल है. यानी सरकार इस रेट पर गेहूं खरीदती है. क्रय केन्द्र के झंझट और तमाम दुश्वारियों से बचने के लिए गरीब किसान अपना गेहूं आढ़तियों या लोकल बनियों को 1400 रु. कुंतल के हिसाब से बेच देता है.

ये आढ़तियों या लोकल बनिए ट्राली लेकर आते हैं उसके घर से गेहूं लाद ले जाते हैं. किसान को नगद कीमत मिल जाती है और सरकार को बेचने के झंझट से मुक्ति भी मिल जाती है.

अब ये आढ़तिए या लोकल बनिए गांव गांव से खरीदे गए गेहूं को ट्रक में भरकर सरकार विक्रय केन्द्र पर पहुंचते हैं और 1925 रु. कुंतल पर बेच देते हैं.

लम्बी लाइन से बचने के लिए ये अक्सर कृषि अफसरों की जेबें भी गर्म कर देते हैं.

सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम खरीदने पर सजा का प्रावधान लागू करे

तो गांव और किसानों की असल समस्या ये है. तो मेरा मानना है कि बिल लाने से पहले सरकार को ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि हर किसान को यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य 1925 रु. प्रति कुंतल की दर से गेहूं की कीमत मिले.

किसानों की आधी समस्याएं तो खुद ब खुद खत्म हो जाएंगी. लेकिन ये बिल इसकी कोई बात नहीं करता.
जारी

सरकार खाद की बिक्री की कालाबाजारी रोके और उपलब्धता सुनिश्चित कराए

समस्या यह है कि पूरे देश में खाद की कालाबाजारी जिस तरीके से सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर होती है उस पर लगाम लगाने की जरूरत है जिस पर सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं देती क्योंकि पर राजनीतिक कार्यकर्ता भी जुड़े होते हैं और सरकारी कर्मचारी और अधिकारी भी।

सरकार असल मुद्दे पर ध्यान देने की जगह पूंजीपतियों के हित साध रही है