April 18, 2021

Tej Times News

Satyam Sarvada

गणेश शंकर विद्यार्थी का नवयुवकों से आह्वान

किन्तु हमारे दुखित हृदय से यह आवाज उठे बिना नहीं रह सकती कि “आज शताब्दियों से मजहबी झगड़े हमारे देश की अधोगति का एक मुख्य कारण हैं।

नवयुवकों से प्रार्थना
भारत के नवयुवको! तुम्हारे सम्मुख
कार्य अति महान् है । सैकड़ों नहीं, कइयो
नही, लाखों ही माता के लाल जिस समय
तक निज देशवासियों की अनन्य सेवा में
अपने समस्त जीवन व्यतीत न करेंगे उस
समय तक इस महान् कार्य का सिद्ध होना
असम्भव है। यदि तुम सच्चे मनुष्य बनना
चाहते हो, तो अपनी शिक्षा का उचित प्रयोग
करना सीखो। इस शिक्षा ने वकील,
बैरिस्टर तथा सरकारी कर्मचारी बहुतेरे
पैदा किए। अब माता को सच्चे देशभक्तों
तथा सच्चे देशसेवकों की आवश्यकता है।
स्वार्थ को त्याग दो। दारिद्य-व्रत धारण
करो। और हर प्रकार के व्यक्तिगत
सुख-सौख्य को तिलांजलि दे निज
देशवासियों की सेवा में लग जाओ। तिलक,
लाजपत, हंसराज, मुंशीराम, गोखले
अश्विनीकुमार आदि के अनेकानेक
उदाहरण तुम्हारे सम्मुख हैं। शिक्षा, स्त्री
शिक्षा, नीच जातियों का उद्धार, सामाजिक
सुधार, पत्र-संपादन, राजनीतिक आंदोलन
जित कार्य में भी तुम प्रवेश करो, उसमें
अपना सर्वस्व अर्पण कर दो। निज मातृभूमि
को मृत्यु से बचाकर अमरत्व की ओर ले
जाने का यही उपाय है।
ऊपर के कामों में से तुम्हारा कर्मक्षेत्र
चाहे कुछ भी हो तथापि एक-दो बातों की
ओर से तुम्हे सावधान कर देना हम
आवश्यक समझते हैं। वह यह कि
“निर्भीकता, कष्ट सहन तथा किसी प्रकार
के सांसारिक भय अथवा सांसारिक
प्रलोभन तुम्हें तुम्हारी मर्यादा से न डिगा
सके । दूसरे यह कि किसी प्रकार का जो
मजहबी पक्षपात तुम्हारे हृदय में स्थान न
कर सके।
स्मरण रहे, एकता-किसी भाव
की भी एकता-राष्ट्रीय उन्नति का मूलमंत्र
है। अर्वाचीन राष्ट्रीयता की नींव मजहब
नहीं, वरन् देश है।
इस सम्बन्ध में जापान तथा चीन का अर्वाचीन इतिहास ही तुम्हें बहुत शिक्षा दे सकता है।
गत वर्षों के  मोहर्रमी झगड़े और गोहत्या तथा गोवध के टंटे प्रत्येक सच्चे देशभक्त को दुःख
देते रहे हैं। विशेषकर गोवध संबंधी झगड़ों
के विषय में हमें दुःख किन्तु निर्भयता के
साथ कहना पड़ता है कि इन झगड़ों में
हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही एक तुल्य
मूर्खता, अदूरदर्शिता तथा देश-शत्रुता
दर्शाते रहे हैं।

इस प्रकार के झगड़ों का कारण केवल यह है कि इस देश के अधिकांश रहने वाले अभी तक देशभक्त तथा देश-सेवा के अर्थों को नहीं समझते।

प्रिय युवकों! हम इस छोटे-से लेख में इस
विषय पर अधिक लिखने में असमर्थ हैं
किन्तु इससे मिलती-जुलती एक और

तीसरी बात है जिसकी ओर से तुम्हें
सावधान कर देना भी हम अपना कर्तव्य
समझते हैं। वह यह है कि तुममें किसी
प्रकार की नैतिक निर्बलता (Moral
weekness) अथवा आत्मबल की न्यूनता
न होनी चाहिए।

तुम्हारा कर्मक्षेत्र चाहे कुछ भी हो, किन्तु सामाजिक कुरीतियों को तुमसे तनिक मात्र भी सहायता न मिले ।

ध्यान रखो, संस्थाएँ मनुष्य के लिए रची
जाती हैं, मनुष्य संस्थाओं के लिए नहीं
रचा गया। संसार की समस्त संस्थाएँ,
चाहे वे आरंभ में कैसी भी लाभदायक
रही हों, समय पाकर मनुष्य जाति की
उन्नति में बाधा डालने लगती हैं और
उस समय उनका विध्वंस कर देना ही
बुद्धिमत्ता है।

उन्नतिशील तथा स्थितिपालन दोनों परस्पर-विरोधिनी शक्तियाँ हैं। हम यह नहीं कहते और न यह चाहते हैं कि भारतवासी यूरोपवालों के अवगुणों को भी ग्रहण कर लें और न हम यह चाहते हैं कि अधिकांश
यूरोप-निवासियों के समान हम सब
सामान्य अर्थों में ला-मजहब हो जावें,

किन्तु हम यह कहे बिना भी नहीं रह
सकते कि जो लोग कुछ युवकों को
सड़ी-गली हानिकारक रूढ़ियों को तोड़ते
हुए देखकर चिल्लाने लगते हैं कि ‘कौम
डूबी! कौम डूबी’, वे चाहे कितने भी सच्चे
देशभक्त क्यों न हों, किन्तु राष्ट्र तथा
राष्ट्रीयता के वास्तविक अर्थों को कदापि
नहीं समझते।
हम किसी भी मजहब के विरोधी नहीं।
हम इस बात में पूर्ण विश्वास रखते हैं कि प्रत्येक उन्नत राष्ट्र में प्रत्येक पुरुष तथा स्त्री को मजहबी विचार रखने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए।

किन्तु हमारे दुखित हृदय से यह आवाज उठे बिना नहीं रह सकती कि “आज शताब्दियों से मजहबी झगड़े हमारे देश की अधोगति का एक मुख्य कारण हैं।

देशभक्त हिन्दुओं तथा देशभक्त मुसलमानों दोनों को अपने-अपने मजहबों पर दृढ़ रहते हुए भी स्मरण रखना चाहिए कि राष्ट्र की रक्षा का निर्भर हिन्दू कर्मकांड तथा हिन्दू रस्मोरिवाज, अथवा मुसलमानी कर्मकांड तथा मुसलमानी रस्मो-रिवाज के बनाए रखने पर नहीं है, और मजहबी कर्मकांड तथा रस्मो-रिवाज की रक्षा करने के स्थान पर देश तथा राष्ट्र की रक्षा करना अपनी तथा मनुष्य
जाति की उन्नति के लिए कहीं अधिक
आवश्यक है।

जो हिन्दू स्वराज्य अथवा हिन्दू
साम्राज्य के स्वप्न देखते हैं, वे ऐसे ही
भ्रम में हैं, जैसे टर्की को अपना वतन
समझने वाले भारतीय मुसलमान।

हम मजहब की वास्तविक स्पिरिट को अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखते हैं, किन्तु जो
मजहब हमें उदारता नहीं सिखाता और
विचारों का भेद होते हुए भी निज देशवासियों
को अपनाना नहीं बतलाता, वह इस 20वीं
शताब्दी में तिलांजलि देने के योग्य है

इसी प्रकार जो विचार हमें सार्वजनिक
समता के पवित्र सिद्धान्त से हटाकर
ऊँच-नीच के गड्ढों में गिराये रखते हैं अथवा
हमारे मार्ग में रुकावट डालते हैं, उनकी
अन्त्येष्टि– क्रियाकर डालना ही इस समय
राष्ट्र-संगठन के कार्य को सच्ची सहायता
देना है।

अन्त में इस लेख को समाप्त करते
समय महात्मा मेजिनी ही के शब्दों में हम
भारत के नवयुकों से अन्तिम निवेदन करते
“देश के नवयुवकों! जब तुम एक
बार विचारपूर्वक अपनी आत्मा के भीतर
अपने जीवन के उद्देश्य को स्थिर कर
चुको, तो फिर संसार की कोई शक्ति
तुम्हारे पैरों को आगे बढ़ने से न रोक
सके! उस उद्देश्य को अपनी सम्पूर्ण
शक्ति द्वारा पूरा करो! पूरा करो!! चाहे
तुम पर प्रेम की वर्षा हो और चाहे घृणा
की बौछार, चाहे दूसरों की सहायता द्वारा
तुम्हें बल प्राप्त हो और चाहे तुम्हें उस
शोकमय निर्जनता में रहना पडे जिसका
प्रायः सर्वदा ही निज आदर्श के शहीदों
को सामना करना पड़ता है। तुम्हारे
सम्मुख तुम्हारा मार्ग स्पष्ट है।

फिर तुम कायर हो तथा स्वयं अपने देश के भविष्य के घातक हो, यदि तुम कष्टों तथा
आपत्तियों के होते हुए भी अंत तक उस
मार्ग का अनुसरण न करो।”

हमारा आशान्वित हृदय भीतर से
साक्षी देता है कि हमारे राष्ट्र की आशा के
स्तम्भ, हमारे नवयुवक, मेजिनी की इस
लांछना के कदापि भागी न होंगे।
-गणेशशंकर विद्यार्थी

इसी प्रकार जो विचार हमें सार्वजनिक
समता के पवित्र सिद्धान्त से हटाकर
ऊँच-नीच के गड्ढों में गिराये रखते हैं अथवा
हमारे मार्ग में रुकावट डालते हैं, उनकी
अन्त्येष्टि– क्रियाकर डालना ही इस समय
राष्ट्र-संगठन के कार्य को सच्ची सहायता
देना है।
अन्त में इस लेख को समाप्त करते
समय महात्मा मेजिनी ही के शब्दों में हम
भारत के नवयुकों से अन्तिम निवेदन करते हैं :
“देश के नवयुवकों! जब तुम एक
बार विचारपूर्वक अपनी आत्मा के भीतर
अपने जीवन के उद्देश्य को स्थिर कर
चुको, तो फिर संसार की कोई शक्ति
तुम्हारे पैरों को आगे बढ़ने से न रोक
सके! उस उद्देश्य को अपनी सम्पूर्ण
शक्ति द्वारा पूरा करो! पूरा करो!!

चाहे तुम पर प्रेम की वर्षा हो और चाहे घृणा की बौछार, चाहे दूसरों की सहायता द्वारा तुम्हें बल प्राप्त हो और चाहे तुम्हें उस शोकमय निर्जनता में रहना पडे जिसका प्रायः सर्वदा ही निज आदर्श के शहीदों को सामना करना पड़ता है। तुम्हारे सम्मुख तुम्हारा मार्ग स्पष्ट है। फिर
तुम कायर हो तथा स्वयं अपने देश के भविष्य के घातक हो, यदि तुम कष्टों तथा
आपत्तियों के होते हुए भी अंत तक उस
मार्ग का अनुसरण न करो।”

हमारा आशान्वित हृदय भीतर से
साक्षी देता है कि हमारे राष्ट्र की आशा के
स्तम्भ, हमारे नवयुवक, मेजिनी की इस
लांछना के कदापि भागी न होंगे।
– गणेश शंकर विद्यार्थी