April 18, 2021

Tej Times News

Satyam Sarvada

संपादकीय : घड़ियाली आंसू

घड़ियाल के आंसू शायद आप लोगो ने न देखें हों पर आम जीवन में इन्सानों के घड़ियाली आंसू आपने अवश्य देखे होंगे।

मतलब तो आप समझ ही गए होंगे और निश्चित रूप से आपको बुरा लगा होगा कि इस समय आंसुओं की चर्चा केवल देश के प्रधान सेवक की हो रही है तो क्यों उनके ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप लगाया जा रहा है।

बात कड़वी है पर सच है कि एक प्रधान सेवक अपनी श्वेत दाढ़ी के साथ जब संसद में रोता है तो भी किसानों की मौत पर नहीं रोता, 70-80 वर्ष के उन किसानों की गिरफ्तारी पर नहीं रोता जिनके बेटे या तो देश की सीमा पर देश की रक्षा में लगे हुए हैं या फिर रक्षा करते करते शहीद हो चुके हैं; वह संवेदना व्यक्त करता है, एक विपक्षी सांसद की विदाई के अवसर पर।

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संवेदना शब्द उचित इसलिए है कि एक राजनेता ही एक राजनेता के दर्द को समझ सकता है।

पर उन किसानों की पीड़ा को समझने का दायित्व किसका है, जिन्हें अपने ही देशज नेता और गोदी पत्रकार खालिस्तानी, पाकिस्तानी, आतंकी और देशद्रोही बता कर, उनके त्यागपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की साजिशें रच रहे हों।

आज भले ही चंद लोग मीडिया को वश में करके उनकी आवाज को दबा लें पर इतिहास कभी उन्हें माफ नहीं करेगा।

इमरजेंसी (Emergency) लगा कर जिस तरह इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने डिक्टेटरशिप का रौद्र प्रदर्शन किया था उसी तरह आज भी सच बोलने वाले पत्रकारों को जेल में डाला जा रहा है, उनके प्रतिष्ठानों से बेइज्जत कर के निष्कासित किया जा रहा है।

इसके पूर्व जब जब आंदोलन हुए उन आंदोलनकारियों को देशद्रोही बता कर उनका अपमान किया गया, चाहे वे छात्र हों या फिर देश के मुसलमान या फिर हिन्दू भी (हाथरस कांड)।

शेष आंसुओं से द्रवित होने वाले पाठक जरा किसानों की मौत पर भी दो आंसू बहा लें अन्यथा प्रधान सेवक की तरह आपके आंसू भी घड़ियाली ही माने जाएंगे। आइए आंदोलन में शहीद हुए 100 से अधिक किसानों को श्रद्धांजलि देते हुए पहले दो मिनट का मौन रख कर अपनी प्रतिक्रिया अच्छी या बुरी अवश्य दें!