April 18, 2021

Tej Times News

Satyam Sarvada

संपादकीय : अद्भुत, अकल्पनीय आंदोलन और राष्ट्रवादी सरकार की अनोखी आंदोलनरोधी रणनीति

राष्ट्रवादी सोच इतनी नशीली चीज है मैं कभी नहीं समझ पाया था, मैंने सदैव देश में इंसानियत और राष्ट्रीयता को अपनी आत्मा के संजो कर रखा।

Editor : Tej Prakash

पिछली सरकारों में जब भी कोई कोढ़ पनपा, मैंने उस कोढ़ को कोसा,चाहे वह इमरजेंसी की कहानियां हों, या 84 के दंगे हों या फिर अन्ना आंदोलन में अन्ना हज़ारे को जेल में डालने की बात रही हो या फिर रामदेव के कालेधन के आंदोलन का दमन करने की कोशिश की, यहां तक जब राहुल गांधी ने मनमोहन के द्वारा बनाए गए प्रस्ताव को फ़ाड़ दिया था तब भी, प्रधानमंत्री के अपमान पर राहुल पर गुस्सा आया था।

2014 के बाद राष्ट्रवाद की आंधी में देश में समरसता का अभाव होता जा रहा है, सारी दुनिया देख रही है, यहां तक कि सिरफिरे राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले इन्स्पेक्टर सुबोध की हत्या कर दी जाती है।

सिरफिरे राष्ट्रवाद के विरोध में बोलने वाली पत्रकार की हत्या कर दी जाती है।

देश में हिंदुत्व को कभी खतरे में नहीं था, अचानक खतरे में दिखने लगता है, ऐसे आवाहन, सोशल मीडिया पर पढ़े लिखे लोगो कि मतिभ्रष्ट कर रहे हैं, और कतिपय हिन्दू बुद्धिजीवी युवा उन पोस्टों से प्रभावित होकर कट्टर हिंदुत्व के खतरनाक गड्ढे की ओर भेड़ों की तरह आंख बन्द करके बढ़ते चले जा रहे हैं।

जिसकी परिणति के रूप में देश में गौहत्या और हिंदुत्व के नाम पर की गई हत्या की घटनाएं हैं। इन घटनाओं को नियंत्रित करना उससे भी ज्यादा मुश्किल है जितना आतंकवाद को रोकना, क्योंकि आतंकवादी संगठित होते है अतः उनकी पहचान फिर भी आसान होती है, पर असंगठित युवा शक्ति जब नियंत्रण के बाहर होती है तो ऐसी हिंसक घटनाओं को रोकना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाता है, विशेषकर जब सत्ता स्वयं ऐसी घटनाओं की उत्प्रेरक हो।

जिस अस्त्र का इस्तेमाल करके, मुस्लिम आतंकियों ने युवा मुस्लिमों को बरगलाने में कामयाब होते रहे, उसी अस्त्र का इस्तेमाल कर हिंदू युवाओं को कुछ विदेशी ताकतें बरगला कर आतंकवाद या अतिवाद की खाई में धकेल देना चाहती हैं।

आज हमें पहचानना होगा कि आखिर इस असंतोष और आंतरिक गृहयुद्ध जैसी स्थितियों का लाभ, भारत की अखंडता और स्थिरता तो नहीं बढ़ाने वाला है।

किसे लाभ होगा भारत के आंतरिक असंतोष और गृहयुद्ध से, यह विचारणीय प्रश्न है?

सालों से भारत की अक्षुण्ण एकता, अखंडता को खंडित करने के अनगिनत प्रयास विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा असफल होते रहे हैं, अब जब हिन्दू मुसलमानों के बीच गहरी खाई खोदने के प्रयास रातदिन चल रहे हैं, इसका फायदा उठा कर विदेशी शक्तियां हिन्दू और मुस्लिम अतिवादियों को बहका कर किसी भी समय भारत में गृहयुद्ध जैसी स्थितियों को जन्म दे सकती हैं।

भारत की धार्मिक समरसता को नष्ट करने के इन प्रयासों और साजिशों और इनके पीछे छिपी हुई ताकतों को पहचानना बहुत आवश्यक है।

पिछले कुछ वर्षों में न केवल भारत की अखंडता पर जारी छद्म युद्ध में आपकी हमारी महती भूमिका है अपने देश की आजादी के लिए अपने सर्वस्व को न्योछावर करने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि होगी।

इस आजादी को छीनने के लिए न केवल लोगों को बरगलाया जा रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी छिन्न भिन्न करने की अंतरराष्ट्रीय साजिशों को अंजाम दिया जा रहा है, जिसके तहत विदेशी इशारे पर छोटी मध्यम स्तर के उद्योग धंधों की कमर तोड़ने के लिए, भारत में पहले नोट बन्दी फिर जी एस टी लागू किया गया, जिससे देश अभूतपूर्व मंदी के दौर में प्रवेश कर गया और देश कोई जी डी पी जमीन को छूने लगी, रुपए का इतना अवमूल्यन हुआ, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

देश पहली बार अभूतपूर्व कर्ज के बोझ तले दब चुका है,और देश की अर्थव्यवस्था को बुरे से बुरे दौर से बाहर निकालने वाला किसान, अन्नदाता आंदोलित होकर 76 दिनों से अपनी आवाज देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।

कृषि कानून वास्तव में गिरती अर्थव्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील साबित होने वाले हैं। किसान गांवों में रहता है इसलिए ऐसा नहीं समझना चाहिए कि उसे अपने हित अनहित की पहचान ही नहीं है।

किसान को भली भांति मालूम है कि इस कानून की आड़ लेकर कृषि को पूंजीपतियों और पूंजीवाद के राहु केतु से ग्रस्त करने की साजिश रची जा चुकी है, एक बार यह कृषि क्षेत्र में प्रवेश कर गया फिर इसे निकालने के लिए दूसरी आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

लेकिन किसानों की देशभक्ति पर ही सवाल उठा कर कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें करने वालों को पहचान लीजिए, ये लिटमस टेस्ट है, उन विदेशी शक्तियों को पहचानने का, जो देश का भला नहीं चाहतीं।

26 जनवरी को किसानों के आंदोलन को देख लेने वाले कृषि मंत्री की बात सच हो गई, और किसानों के बीच उन लोगों को घुसेड़ दिया गया जो अतिवादी थे, और एक साजिश के तहत लालकिले पर सिख समुदाय का पवित्र झंडा लगा कर, पहले से तैयार स्क्रिप्ट पर न्यूज ब्लास्ट होने लगे कि खालिस्तानी झंडा फहरा दिया गया।

अब आइए गौर फरमाते हैं इन फर्जी राष्ट्रवादियों के चंद बेहूदे सवालों पर :

भारत में किसान होने की होड़ क्यों लगी है?

महिला सिपाही पर तलवार से हमला करने वाले किसान हैं?
तिरंगे का अपमान करने वाले किसान हैं?
खालिस्तानी और पाकिस्तानी किसान हैं?
ब्लू फिल्मों में सेक्सवर्कर बनने वाली
विदेशिनें भी किसान हैं?
जेहादी किसान हैं, माओवादी किसान हैं?
आतंकवादी किसान हैं, अर्बन नक्सली किसान हैं?
किसान की परिभाषा चड्ढी के रबर की तरह फैल रही है?
आखिर भारत में किसानबनने की होड़ क्यों लगी है?
सेक्स ऐक्ट्रेस मिया खलीफा क्यों किसान बन रही है?
ये अरबपति जेहादी रेहाना क्यों हमारे लिए लड़ने आना चाह रही है भारत?
यह #टूलकिट षड्यंत्र क्या है?
जिससे दिल्ली में दंगे का षड्यंत्र रचा गया
ये कनाडा का आतंकी संगठन “पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन” खालिस्तानियों की फंडिंग क्यों कर रहा है?

वास्तव में भयभीत होने की जरूरत है ऐसे सवाल उठाने वालों से, भय है उस षड्यंत्र का, जिसमें भारत के भी लाखों नेता, अफसर, उद्योगपति, एनजीओ वर्कर, नक्सली, आतंकवादी गंठजोड़ बनाकर सम्मलित हैं।

मैं एक प्रश्न स्वयं से बार-बार पूछ रहा हूं,
“भारत में 70 करोड़ से अधिक किसान हैं
उनमें से 90 प्रतिशत 5 बीघा खेत से कम जमीन वाले हैं।

किसानों ने ही नरेन्द्र मोदी की सरकार दोबारा बनवाई है। उनमें से हजारों किसान पिछले 76 दिनों से दिल्ली में धरना दे रहे हैं, और 150 से अधिक किसान इस आंदोलन में शहीद हो चुके हैं। क्यों नरेंद्र मोदी स्वयं किसानों से मिलकर उनके मन की बात को समझने का प्रयास करते?

ये किसान और उनके परिवार आजादी की लड़ाई से आज तक शहादत का तो इतिहास ही रच चुके हैं।

आज भी सिंगू बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर सैकड़ों किसान ऐसे हैं जिनके बेटे देश की सीमाओं पर खड़े देश की सुरक्षा कर रहे हैं पर उनके मां बाप और भाइयों को इस सरकार के मंत्री, नेता और कार्यकर्ता आतंकवादी, खालिस्तानी और षड्यंत्रकारी कहकर अपमानित कर रहे हैं।

जिन किसानों को आज आतंकी कहा ही नहीं जा रहा उनसे लडने की रणनीति के तहत इस सरकार द्वारा सड़कों और हाईवे पर कीलें गाड़ी जा रही हैं, बैरिकेड्स को कंक्रीट डालकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की भांति दीवार खड़ी की जा रही है मानों किसान कोई आतंकी हों और सशस्त्र हमला करने जा रहे हों।

सरकार और किसानों के बीच संवाद स्वयं सरकार द्वारा रोक दिया गया है। सरकार इस कथित काले कानून को वापस लेने को तैयार नहीं दिख रही और किसान अपना आंदोलन वापस लेने को तैयार नहीं दिख रहे, परिणाम जो भी हो राष्ट्र और लोकतंत्र के लिए शुभ तो नहीं कहे जा सकते।

सरकार और किसानों को चाहिए कि कोई मध्य मार्ग निकाल कर देश की प्रगति को मार्ग प्रशस्त करें, सरकार इन कानूनों को पुनर्विचार और संशोधन हेतु संसद में भेजने का निर्णय ले और विपक्षी दलों और किसानों की सहमति से कानून बनाया जाय जिससे किसी भी कीमत पर भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि और कृषिकार्य से जुड़े 70 करोड़ किसानों भविष्य सुरक्षित बना रहे क्योंकि किसानों की कमजोरी से देश कमजोर होगा।