April 18, 2021

Tej Times News

Satyam Sarvada

कायर बनने की जगह, मारने और मरने की कला सीखे मनुष्य : महात्मा गांधी

महात्मा गांधी जी के विषय में एक भयानक भ्रांति फैलाई गई है कि वे कायरता का संदेश देते थे और उनका कहना था कि अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे तो अपना दूसरा गाल आगे कर दो, यह सरासर झूठ है।

महात्मा गांधी के विषय में सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार पढ़ कर शायद आपके मन की भ्रांति मिट सके और अगर आपको अच्छा लगे तो इसे अन्यों की जानकारी के लिए शेयर करना न भूलें।

ऐसा कभी कभी ही होता है कि सामान्य स्तर से ऊपर उठकर कोई असाधारण आत्मा, जिसने ईश्वर के विषय में अधिक गहराई से चिंतन किया है, दैवी हेतु या अधिक स्पष्टता के साथ प्रतिसंवेदन करती है और देवी मार्गदर्शन के अनुरूप वीरतापूर्वक आचरण करती है।
ऐसी महान आत्मा का आलोक अंधकारमय और अस्तव्यस्त संसार के लिए प्रखर संकेत दीप का काम देता है। गांधीजी उन पैगंबरों में से है जिनमें हृदय का शौर्य, आत्मा का शील और निर्भीक व्यक्ति की हंसी के दर्शन होते हैं।

उनका जीवन और उनके उपदेश उन मूल्यों के साक्षी हैं, जो राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय की सीमा से परे सार्वभौम हैं और जो युगों से इस देश की धरोहर रहे हैं – आत्मा में आस्था, उसके रहस्यों के प्रति आदर-भाव, पवित्रता में निहित सौंदर्य, जीवन के कर्तव्यों का स्वीकार, चरित्र की प्रामाणिकता।

ऐसे अनेक लोग हैं, जो गांधीणी को एक ऐसा पेशेवर राजनीतिज्ञ मानकर खारिज कर देते जो नाजुक मौकों पर अनाड़ी साबित होता रहा । एक मायने में राजनीति एक पेशा है और राजनीतिज्ञ यह व्यक्ति है जो सार्वजनिक मामलों को कुशलता पूर्वक चलाने में दक्ष हो।

एक दूसरे अर्थ में, राजनीति एक कर्तव्य है और राजनीतिज्ञ वह व्यक्ति है जो अपने देशवासियों की रक्षा करने, उन्हें ईश्वर के प्रति आस्था रखने और मानवता से प्रेम करने की प्रेरणा देना अपना जीवन लक्ष्य मानता है और उसके प्रति पूरी तरह जागरूक रहता है।

ऐसा राजनीतिक शासन के व्यावहारिक संचालन में असफल हो सकता है, लेकिन वह अपने साथियों के मन में अपने लक्ष्य के प्रति अजेय आस्था उत्पन्न करने में अवश्य सफल होता है।

गांधी मूलतः इस द्वितीय अर्थ में ही राजनीतिज्ञ हैं। उन्हें इस बात का पक्का विश्वास है कि यदि हम आत्म जगत में, अध्यात्म लोक में अपने चित्त को दृढ़ रखें, तो हम निश्चय ही एक ऐसे संसार की रचना कर सकते हैं जिसमें न गरीबी होगी न बेरोजगारी और जिसमें युद्धों तथा रक्तपात के लिए भी कोई स्थान नहीं होगा।

उनका कहना है: “कल की दुनिया, अहिंसा पर आधारित समाज होगी, होनी चाहिए । यह एक दूरस्थ लक्ष्य, एक अव्यावहारिक ‘यूटोपिया मालूम हो सकता है लेकिन यह अप्राप्य कदापि नहीं है, क्योंकि इस पर आज ही और अभी अमल किया जा सकता है।

कोई भी व्यक्ति दूसरों की प्रतीक्षा किए बिना भावी संसार की जीवन पद्धति को-अहिंसक पद्धति को-अपना सकता है। और यदि व्यक्ति ऐसा कर सकता है तो पुरे पूरे व्यक्ति समूह क्यों नहीं कर सकते । समूचे राष्ट्र क्यों नहीं कर सकते? लोग अक्सर शुरुआत करने से इसलिए हिचकते हैं कि उन्हें लगता है कि लक्ष्य को पूरी तरह प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। हमारी यह मनोवृत्ति ही प्रगति के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट -यह रुकावट ऐसी है जिसे हर आदमी, अगर वह चाहे तो, दूर कर सकता है।

एक आम आलोचना यह है कि गांधीजी की दृष्टि उनके गृहीत ज्ञान से कहीं ऊंची उडान भरती है, कि वे इस सुगम किंतु भ्रांत धारणा को लेकर आगे बढ़ते कि संसार सत्पुरुषों से भरा पड़ा है। यह वस्तुतः गांधी के विचारों का मिथ्याकथन है। वे अच्छी तरह समझते हैं कि जिंदगी ज्यादा-नो ज्यादा दूसरे दर्जे की जिंदगी होता है और हमें बराबर आदर्श और संभाव्य के बीच समझौता करते हुए चलना पड़ता है। स्वर्ग में कोई समझौता नहीं है, न कोई व्यावहारिक सीमाएं हैं लेकिन पृष्यों पर तो हम प्रकृति के क्रूर नियमों से बंधे हैं। हमें मानवीय विकारों की स्वीकार करते हुए ही व्यवस्थित विश्व की रचना करनी है। बड़े प्रयास और कठिनाई से ही आदर्शों की सिद्धि हो पाती है। यह महसूस करते हुए भी कि सभ्य समाज का आदर्श अहिंसा ही है, गांधीजी हिंसा की अनुमति देते हैं।

“यदि व्यक्ति में साहस का प्रभाव हो तो मैं चाहूंगा कि यह खतरा सामने देखकर कायरों की तरह भाग खड़े होने के बजाए, मारने और मरने की कला सीखे।”
“दुनिया पूरी तरह तर्क के सहारे नहीं चलती । जीवन जीने की प्रक्रिया में ही कुछ-न-कुछ हिंसा होती ही है और हमें न्यूनतम हिंसा का रास्ता चुनना पड़ता है।”
“समाजों की प्रगति के तीन चरण स्पष्टतः परिलक्षित हैं-पहले चरण में जंगल का नियम चलता है, जिसमें हिंसा और स्वार्थ का बोलबाला होता है, दूसरे चरण में विधि का नियम और अदालतो. पुलिस तथा कारागृहों सहित निष्पक्ष न्याय की व्यवस्था होती है। और तीसरा चरण वह है जिसमें अहिंसा और निस्वार्थ भाव का प्राधान्य होता तथा प्रेम और विधि एक ही होते हैं। यह अंतिम चरण ही सभ्य मानवता का लक्ष्य है और गांधी जैसे लोगों का जीवन तथा कार्य हमें उसी के निकटतर ले आते हैं। गांधी विचारों और उनकी चिंतन-प्रक्रिया को लेकर आज बड़ी भ्रांतियां फैली हुई है।